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18.01.1969 अव्यक्त बापदादा

"...बच्चों की बुद्धि में यह घूमता रहे कि अब हमारी क्या स्टेज है।

जो अन्तिम स्टेज धारण करनी है वह लक्ष्य पहले से ही बुद्धि में रखेंगे तो पुरूषार्थ तेज चलेगा।

विनाश के समय की जो सीन दिखाई उसमें आप बच्चों की अडोल अवस्था रहे।..."

 

 

 


02.02.1969 अव्यक्त बापदादा

"...जो अन्तिम कर्मातीत अवस्था का अनुभव था वह ड्रामा प्रमाण और होता।

लेकिन था ही ऐसे इसलिए थोड़े ही सामने थे।

सामने होते भी जैसे सामने नहीं थे।

स्नेह तो वतन में भी है और रहेगा। ..."

 

 

 


13.03.1969 अव्यक्त बापदादा

"...जितना शक्ति स्वरूप उतना ही प्रेम स्वरूप।

अभी तक दोनों नहीं हैं।

कभी प्रेम की लहर में कभी शक्ति रूप में स्थित रहते हो।

दोनों ही साथ और समान रहे।

यह है शक्तिपन की अन्तिम सम्पूर्णता की निशानी।..."

 

 

 

 

 

20.03.1969 अव्यक्त बापदादा

"...गुणों को ही धारण करना है।

तो उनके अन्तिम स्थिति और अपने वर्तमान स्थिति में कितना फर्क समझते हो?

उसके लिए कितना समय चाहिए।

साकार का सबूत तो इन आँखों से देखा।

उनके हर गुण हर कर्म को अपने कर्म और वाणी से भेंट करो तो मालूम पड़ जायेगा।..."

 

 

 


18.05.1969 अव्यक्त बापदादा

"...अन्तिम नारा भी भारत माता शक्ति अवतार का गायन है।

गोपी माता थोड़ेही कहते हैं।

अब शक्ति रूप का पार्ट है।

गोपीकाओं का रूप साकार में था।

अब अव्यक्त रूप से शक्ति का पार्ट है।

हरेक जब अपने शक्तिरूप में स्थित होंगे तो इतने सभी की शक्ति मिलाकर कमाल कर दिखायेगी।

यादगार रूप में अन्तिम चित्र कौन सा दिखाया हुआ है?

पहाड़ को अंगुली देने का।

अंगुली, यह शक्ति की देनी है।

इससे ही कलियुगी पहाड़ खत्म होगा।

इसमें हरेक की अंगुली की दरकार है।

अभी वह अंगुली पुरी रीति नहीं है।

उठाते जरूर हैं परन्तु कोई की कभी सीधी कोई की कभी टेढ़ी हो जाती है।

जब पूरी अंगुली होगी तब प्रभाव निकलेगा।..."

 

 

 

 

17.07.1969 अव्यक्त बापदादा

"...अपने को मेहमान समझना।

अगर मेहमन समझेंगे तो फिर जो अन्तिम सम्पूर्ण स्थिति का वर्णन है वह इस मेहमान बनने से होगा।

अपने को मेहमान समझेंगे तो फिर व्यक्त में होते हुए भी अव्यक्त में रहेंगे।

मेहमान का किसके साथ भी लगाव नहीं होता है।

हम इस शरीर में भी मेहमान हैं।

इस पुरानी दुनिया में भी मेहमान है।

जब शरीर में ही मेहमान हैं तो शरीर से भी क्या लगन रखें।

सिर्फ थोड़े समय के लिए यह शरीर काम में लाना है।..."

 

 

 

 

"...दाता के बच्चे तो सभी देने वाले ठहरे।

आप सभी के एक सेकेण्ड की दृष्टि के, अमूल्य बोल के भी प्यासे रहेंगे।

ऐसा अन्तिम दृश्य अपने सामने रख पुरुषार्थ करो।

ऐसा न हो कि दर पर आयी हुई कोई भूखी आत्मा खाली हाथ जाये।

साकार में क्या करके दिखाया?

कोई भी आत्मा असन्तुष्ट होकर न जाये।

भल कैसी भी आत्मा हो लेकिन सन्तुष्ट होकर जाये।

तो ऐसी बातें सोचनी चाहिए।..."

 

 

 

 

 

16.10.1969 अव्यक्त बापदादा

"...फाइनल पेपर अनेक प्रकार के भयानक और न चाहते हुए भी अपने तरफ आकर्षित करने वाली परिस्थितियों के बीच होंगे।

उनकी भेट में जो आजकल की परिस्थितियाँ है वह कुछ नहीं है।

जो अन्तिम परिस्थिति आने वाली है, उन परिस्थितियों के बीच पेपर होना है।

इसकी तैयारी पहले से करनी है।

इसलिए जब अपने को देखो कि बहुत बिजी हूँ, बुद्धि बहुत स्थूल कार्य में बिजी है, चारों ओर सरकमस्टान्सेज अपने तरफ खैंचने वाली है तो ऐसे समय पर यह अभ्यास करो।

तब मालूम पड़ेगा कहाँ तक हम ड्रिल कर सकते है।

यह भी बात बहुत आवश्यक है।

इसी ड्रिल में रहते रहेंगे तो सफलता को पायेंगे। ..."

 

 

 

 

20.12.1969 अव्यक्त बापदादा

"...ईश्वरीय स्नेह और शक्ति से वारिस बनते हैं, तो वारिस बनाने है।

यह फर्स्ट स्टेज का पुरुषार्थ है।

वाणी से किसी को पानी नहीं कर सकते लेकिन स्नेह और शक्ति से एक सेकेण्ड में स्वाहा करा सकते है।

यह भी अन्त में मार्क्स मिलते हैं।

वारिस कितने बनाये प्रजा कितनी बनाई।

वारिस भी किस वैराइटी और प्रजा भी किस वैराइटी की और कितने समय में बने। फाइनल पेपर आज सुना रहे हैं।

किस-किस क्वेश्चन पर मार्क्स मिलते है एक तो यह क्वेश्चन अन्तिम रिजल्ट में होगा दूसरा सुनाया अन्त तक सर्विस का शो।

और तीसरी बात थी आदि से अन्त तक जो अवस्था चलती आई है उसमें कितना बारी फेल हुए है, पूरा पोतामेल एनाउन्स होगा।

कितने बारी विजयी बने और कितने बारी फेल हुए और विजय प्राप्त की तो कितने समय में?

कोई भी समस्या को सामना करने में कितना समय लगा?

उनकी भी मार्क्स मिलेगी।

तो सारे जीवन की सर्विस और स्वस्थिति और अन्त तक सर्विस का सबूत यह तीन बातें देखी जाती हैं।..."

 


 

1970
26.03.1970 अव्यक्त बापदादा

"...संकल्प करना, प्लान्स बनाना फिर उसपर चलना, अब वह दिन नहीं।

अब पढाई कहाँ तक पहुंची है?

अब तो अन्तिम स्टेज पर है। ..."

 

 

 

 

 

"...नज़र में ऐसे दिखाना है जो उनको नज़र आप लोगों की बदली हुयी नज़रों को ही देखें।

तो अब वह पुरानी नज़र नहीं, पुरानी वृत्ति नहीं।

तब अन्तिम नगाड़ा बजेगा।

यह संगठन कॉमन नहीं है, यह संगठन कमाल का है।

इस संगठन से ऐसा स्वरुप बनकर निकलना है जो सभी को साक्षात् बापदादा के ही बोल महसूस हों।

बापदादा के संस्कार सभी के संस्कारों में देखने में आयें।

अपने संस्कार नहीं।

सभी संस्कारों को मिटाकर कौन से संस्कार भरने हैं?

बापदादा के।..."

 

 

 

 

 

 

"...यह मैं और मेरा तुम और तेरा यह चार शब्द हैं इनको मिटाना है।

इन चार शब्दों ने ही सम्पूर्णता से दूर किया है।

इन चार शब्दों को सम्पूर्ण मिटाना है।

साकार के अन्तिम बोल चेक किये, हर बात में क्या सुना?

बाबा-बाबा।

सर्विस में सफलता न होने की करेक्शन भी कौन सी बात में थी?

समझाते थे हर बात में बाबा-बाबा कहकर बोलो तो किसको भी तीर लग जायेगा। ..."

 

 

 

 

 

02.04.1970 अव्यक्त बापदादा

"...अब बापदादा ऐसा मास्टर सर्वशक्तिमान बनाने की पढ़ाई पढ़ा रहे हैं, जो किसके भी सूरत में उसकी स्थिति और संकल्प स्पष्ट समझ सको।

शक भी न रहे।

स्पष्ट मालूम पड़ जाये।

यह है अंतिम पढ़ाई की स्टेज।

साकार रूप में थोड़ी सी झलक अंत में दिखाई।

जो साकार रूप में साथ थे उन्होंने कई ऐसी बातें नोट की हैं।

ऐसी ही स्थिति नंबरवार सभी बच्चों की होनी है।

जब ऐसी स्थिति होती जाएगी तब अन्तिम स्वरुप और भविष्य स्वरुप आप सभी की सूरत से सभी को स्पष्ट दिखने में आएगा। ..."

 

 

 

 

 

05.04.1970 अव्यक्त बापदादा

"...मधुरता भी चाहिए। शक्ति रूप भी चाहिए।

देवियों के चित्र बहुत देखते हैं तो उसमें क्या देखते हैं?

जितना ज्वाला उतनी शीतलता।

कर्त्तव्य ज्वाला का है सूरत शीतलता की है।

यह है अन्तिम स्वरुप।..."

 

 

 

 

 

27.07.1970 अव्यक्त बापदादा

"... अन्तिम स्टेज ऐसी होनी है जिसमें हरेक के मुखड़े में यह सर्व लक्षण प्रसिद्ध रूप में दिखाई पड़ेंगे।

अभी कोई गुप्त है, कोई प्रत्यक्ष है।

कोई गुण विशेष है कोई उनसे कम है।

लेकिन सम्पूर्ण स्टेज में यह सभी लक्षण समान रूप में और प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देंगे।

जिससे सभी की नम्बरवार प्रत्यक्षता होनी है।

जितना-जितना जिसमें प्रत्यक्ष रूप में गुण आते जाते हैं उतनी-उतनी प्रत्यक्षता भी होती जा रही है।..."

 

 

 

 

 

22.10.1970 अव्यक्त बापदादा

"...जहाँ तक अन्तिम स्टेज साकार रूप में देखी, वहाँ तक नॉलेजफुल, जानी जाननहार बने हो?

साकार बाप के समान बनने में अन्तर रहा हुआ है इसलिए फुल नहीं कहते हो।

कहाँ तक फुल बनना है उसका एग्ज़ाम्पुल स्पष्ट है ना?

ज्यादा मास्टर रचयिता के नशे में रहते हो वा रचना के?

किस नशे में ज्यादा समय रहते हो।

आज ये प्रश्न क्यों पूछा?

आज सर्व रत्नों को देख और परख रहे थे कि कहाँ तक फ्लोलेस हैं अर्थात् फुल हैं।

अगर फुल नहीं तो फेल।

तो आज फुल और फेल की रेखा देख रहे थे।

तब प्रश्न पूछा कि फुल बने हो?

जैसे बाप की महिमा है सभी बातों में फुल है ना।

तो बच्चों को भी मास्टर नॉलेजफुल तो बनना ही है।

सिर्फ नॉलेज में नहीं लेकिन मास्टर नॉलेजफुल। ..."

 

 

 

 


"...अभी थोड़े समय के अन्दर धर्मराज का रूप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे।

क्योंकि अब अन्तिम समय है।

अनुभव करेंगे कि इतना समय बाप के रूप में कारण भी सुने, स्नेह भी दिया, रहम भी किया, रियायत भी बहुत की लेकिन अभी यह दिन बहुत थोड़े रह गए हैं।

फिर अनुभव करेंगे कि एक संकल्प के भूल एक का सौगुणा दण्ड कैसे मिलता है।

अभी-अभी किया और अभी-अभी इसका फल व दण्ड प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करेंगे अभी वह समय बहुत जल्दी आने वाला है।

इसलिए बापदादा सूचना देते हैं क्योंकि फिर भी बापदादा बच्चों के स्नेही है।..."

 

 

 

 

 

05.11.1970 अव्यक्त बापदादा

"...अपने को अब तक पुरुषार्थी मूर्त समझते हो वा साक्षात् और साक्षात्कार मूर्त भी समझते वा अनुभव करते हो?

वा समझते हो कि यह अन्तिम स्टेज है?

अभी-अभी आपके भक्त आपके सम्मुख आयें तो आपकी सूरत से उनकी किस मूर्त का साक्षात्कार होगा। कौन-सा साक्षात्कार होगा?

साक्षात्कार मूर्त सदैव सम्पूर्ण स्थिति का साक्षात्कार करायेंगे, लेकिन अभी अगर आपके सामने कोई आये तो उन्हें ऐसा साक्षात्कार करा सकेंगे?

ऐसे तो नहीं कि आपके पुरुषार्थ की उतराई और चढ़ाई का उन्हें साक्षात्कार होता रहेगा।

फोटो निकालते समय अगर कोई भी हलचल होती है तो फोटो ठीक निकलेगा?

ऐसे ही हर सेकण्ड ऐसे ही समझो कि हमारा फोटो निकल रहा है।

फोटो निकालते समय सभी प्रकार का ध्यान दिया जाता है वैसे अपने ऊपर सदैव ध्यान रखना है।

एक-एक सेकण्ड इस सर्वोत्तम वा पुरुषोत्तम संगमयुग का ड्रामा रूपी कैमरे में आप सभी का फोटो निकलता जाता है।

जो वही चित्र फिर चरित्र के रूप में गायन होता आएगा।

और अभी के भिन्न-भिन्न स्टेज के चित्र, भिन्न-भिन्न रूप में पूजे जायेंगे।

हर समय यह स्मृति रखो कि अपना चित्र ड्रामा रूपी कैमरे के सामने निकाल रहा हूँ।

अब के एक-एक चित्र एक-एक चरित्र गायन और पूजन योग्य बनने वाले

हैं।..."

 

 

 

 

 

03.12.1970 अव्यक्त बापदादा

"...ब्राह्मणों का अन्तिम स्वरूप क्यों गाया जाता है, मालूम है?

इस स्थिति का वर्णन है इच्छा मात्रम् अविद्या।

अब अपने पूछो इच्छा मात्रम् अविद्या ऐसी स्थिति हम ब्राह्मणों की बनी है?

जब ऐसी स्थिति बनेगी तब जयजयकार और हाहाकार भी होगी।

यह है आप सभी का अन्तिम स्वरुप।..."

 

 

 

 

 

09.12.1970 अव्यक्त बापदादा

"...हरेक के दो नयनों से दो स्वरुप का साक्षात्कार होगा।

कौन-से दो स्वरुप?

सुनाया था कि निराकारी और दिव्यगुणधारी।

फ़रिश्ता रूप और दैवी रूप।

हरेक ऐसे अनुभव करेंगे वा हरेक से ऐसा अनुभव होगा जैसे कि चलता फिरता लाइट हाउस और माईट हाउस हो।

ऐसे अपने स्वरुप का साक्षात्कार होता है?

जब 5000 वर्ष को कैच सकते हो, अनुभव कर सकते हो तो इस अन्तिम स्वरुप का अनुभव नहीं होता है?

अभी जो कुछ कमी रह गयी है वह भरकर ऐसे अनुभवी मूर्त बनकर जायेंगे।

तो देखना कभी कुछ कमी न रह जाये। ..."