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गीत:-

गोप गोपी नाँचें गायें आनन्द मनाये... आज जन्म हुआ है मनमोहन का...

 

18.01.1969
"...बहुत ही सुन्दर सतयुग की सीनरियॉ थी। एक कृष्ण बाल रूप में झूले में झूल रहा था, साथ में कान्ता (दासी) झुला रही थी। दूसरे में सखे-सखियों का खेल था। मतलब तो सतयुग की दिनचर्या थी। ..."

 

 

 

09.06.1969
"... जितना-जितना नजदीक होते जायेंगे, उतना-उतना नजारे भी नजदीक होते जायेंगे। सतयुग में चलना है और खेल-पाल करना है। यह तो निश्चित है ही आज जो भी सभी बैठे हैं उनमें से कौन समझता है कि हम श्रीकृष्ण के साथ पहले जन्म में आयेंगे? उनके फैमिली में आयेंगे वा सखी सखा बनेंगे वा तो स्कूल के साथी बनेंगे? जो समझते हैं तीनों में से कोई न कोई जरूर बनेंगे ऐसे निश्चय बुद्धि कौन है? ..."

 

 

 

05.03.1971
"...जो आप लोगों का यादगार चित्र है। कृष्ण के चित्र में सृष्टि का गोला है ना। तो लाइट का गोला अर्थात् लाइट के चित्र के अन्दर सदैव रहना है। लाइट का गोला बनने से ही विश्व के राज्य का गोला ले सकते हो। तो अभी है लाइट का गोला भविष्य में होगा यह राज्य का गोला। ..."

 

 

 

21.01.1972
"...यहाँ बैठे हुए भी अनेक आत्माओं को, जो भी आपके सतयुगी फैमिली में समीप आने वाले होंगे उन्हों को आप लोगों के फरिश्ता रूप और भविष्य राज्य-पद के - दोनों इकट्ठे साक्षात्कार होंगे। जैसे शुरू में ब्रह्मा में सम्पूर्ण स्वरूप और श्रीकृष्ण का - दोनों साथ-साथ साक्षात्कार करते थे..."

 

 

 

02.08.1972
"...वह भले भाषण में सभा को हंसा लेते, रूला लेते, लेकिन अशरीरीपन का अनुभव नहीं करा सकते, बाप से स्नेह नहीं पैदा करा सकते। कृष्ण से स्नेह करा सकते, लेकिन बाप से नहीं करा सकते। ..."

 

 

 

05.12.1974
"...जैसे आप लोग चित्र में कृष्ण को सृष्टि के ग्लोब पर दिखाते हो-ऐसा ही चित्र अपनी प्रैक्टिकल स्थिति का बनाओ। इस व्यक्त देश व इस पुरानी दुनिया से उपराम। व्यक्त भाव और व्यक्त वस्तुओं आदि सबसे उपराम अर्थात् इनके ऊपर साक्षी होकर खड़े रहें। जैसे पाँव के नीचे ग्लोब दिखाते हैं व ग्लोब के ऊपर बैठा हुआ दिखाते हैं अर्थात् उनका मालिकपन व अधिकारीपन दिखाते हैं तो ऐसे अपना चित्र बनाओ।..."

 

 

 

 

29.08.1975
"...एक की यादगार नहीं है, एक के साथ आप सब भी हो। तो कल आप सबकी जन्माष्टमी मनायेंगे। सभी कृष्ण समान देवताई स्वरूप में तो होंगे न? आप सबके देवताई स्वरूप के स्मृति का दिन है। दुनिया वाले मनायेंगे और आप क्या करेंगे? वह मनायेंगे आप मनाने वालों के प्रति महादानी और वरदानी बनेंगे। ..."

 

 

 

 

12.01.1977
"...जैसे आपके भविष्य श्री कृष्ण के चित्र को जन्म से ही ताजधारी दिखाते हैं, मुख में गोल्डन स्पून (Golden Spoon In Mouth) अर्थात् जन्मते ही सर्व प्राप्ति स्वरूप दिखाते हैं। हेल्थ (Health), वेल्थ (Wealth), हैपीनेस (Happiness) सबमें सम्पन्न स्वरूप हैं। प्रकृति भी दासी है। यह सब बातें, जो भविष्य में प्राप्त होने वाली हैं, उसका अनुभव अब संगमयुग में भी होना है, या सिर्फ भविष्य का ही गायन है? संस्कार यहाँ से ले जाने हैं या वहाँ बनने हैं? त्रिकालदर्शी की स्टेज अभी है या भविष्य में? सम्मुख बाप और वर्से की प्राप्ति अभी है अथवा भविष्य में? श्रेष्ठ स्टेज अब है या भविष्य में? अभी श्रेष्ठ है ना।..."

 

 

 

 

02.02.1977
"... जिन्होंने सदा के लिए पुरानी दुनिया से किनारा किया है और बाप को सदा साथी बनाया है, वही यमुना के किनारे साथ महल वाले होंगे। श्री कृष्ण के साथ पढ़ने वाले कौन होंगे? पढ़ने पढ़ाने वाले साथी भी होंगे ना? जिसका सदैव पढ़ाई पढ़ाने और पढ़ने में विशेष पार्ट है वही वहाँ भी विशेष पढ़ाई के साथी बनेंगे। रास करने वाले कौन होंगे? जिन्होंने संगम पर बाप के साथ समान संस्कार मिलाने की रास मिलाई होगी। तो यहाँ जिनके बाप समान संस्कारों के रास मिलती है वे वहाँ रास करेंगे। रॉयल फैमली (ROYAL Family;उच्च परिवार) में कौन आयेंगे? जो सदैव अपनी प्यूरिटी की रॉयलटी में रहते हैं। कहाँ भी हद के आकर्षण में आँख नहीं डूबती। सदा अलंकारों से सजे हुए होते हैं। सदा श्रृंगारे हुए मूर्ति, ऐसी रॉयलटी वाले रॉयल फैमली में आयेंगे। वारिस कौन बनेंगे? वारिस अर्थात् अधिकारी। तो जो यहाँ सदा अधिकारी स्टेज पर रहते, कभी भी माया के अधीन नहीं होते, अधिकारीपन के शुभ नशे में रहते, ऐसे अधिकारी स्टेज वाले ही वहाँ भी अधिकारी बनेंगे। अब हर एक को अपने आप को देखना पड़े कि मैं कौन हूँ? यह पहेली है। किसी-किसी का सारे जीवन में साथ-साथ पार्ट भी है - साथ पढ़ने का, साथ रास करने का, साथ महल में रहने का, रॉयल फैमली में भी साथ होंगे। कुछेक आत्माओं का सर्व अधिकार भी है। यह है नई दुनिया की रूपरेखा।’’..."

 

 

 

05.02.1977
"...आदि स्वरूप की महिमा तो अभी तक भक्त भी गा रहे हैं, सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरूषोत्तम, सम्पूर्ण आहिंसक। यह महिमा है अन्तिम फरिश्ते स्वरूप की अर्थात् भविष्य आदि स्वरूप की। जैसे ब्रह्मा सो श्री कृष्ण कहते हैं वैसे अन्तिम फरिश्ता सो देवता। तो यह है आदि स्वरूप की महिमा।..."

 

 

 

14.02.1978
"...एक-एक रतन वैल्युएबल है क्योंकि अगर वैल्युएबल रतन नहीं होते तो कोटो में कोई आप ही कैसे आते। जिसको दुनिया अपनाने के लिए तड़प रही है उसने मुझे अपना लिया। एक सेकेण्ड के दर्शन के लिए दुनिया तड़प रही है, आप तो बच्चे बन गये तो कितना नशा, कितनी खुशी होनी चाहिए, सदा मन खुशी में नाचता रहे। वर्तमान समय की खुशी का नाचना भविष्य चित्र में भी दिखाते हैं। कृष्ण को सदैव डान्स के पोज़ में दिखाते हैं ना।..."

 

 

 

08.01.1979
"...जैसे भारत के शास्त्रों में दिखाया है, जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो जेल में जन्म होते हुए भी जब नदी पार किया तो साँप ही सेफ्टी के साधन बन गये, तो विदेशी बच्चों को वरदान है कि कैसे भी वातावरण अशुद्ध है, कैसी भी जीवन पार्ट देख रहे हैं लेकिन फिर भी बाप की छत्रछाया बच्चों को सदा सेफ रखती आई है और अन्त तक रखेगी।..."

 

 

 

23.01.1979
"...जैसे कृष्ण को लाडला होने के कारण झूले में झुलाते हैं ना। संगमयुगी ब्राह्मणें का झूला अतीन्द्रिय सुख का झूला है। तो इसी झूले में सदा झूलते रहते हो! कभी भी देह अभिमान में आना अर्थात् झूले से निकल धरनी पर पांव रखना। धरनी पर पाँव रखते तो मैले हो जाते हैं। तो ऊंचे ते ऊंचे बाप के बच्चे सदा स्वच्छ होते - मैले नहीं। तो सदा इसी अतीन्दिय सुख में झूलते रहो।..."

 

 

 

14.11.1979
"...जो अभी सदा इस झूले में झूलते वही श्रीकृष्ण के साथ-साथ झूलेंगे। ऐसा पुरूषार्थ है ना? इसको कहा जाता है तीव्र पुरूषार्थ।..."

 

 

 

03.12.1979
"...जैसे सेवा अर्थ आप लोगों का एक चित्र है भविष्य श्रीकृष्ण के रूप का। सारे विश्व का गोला उनके हाथ में दिखाया है। विश्व का मालिक होने के कारण विश्व का गोला उनके हाथ में दिखाया है। ऐसे वर्तमान समय भी विश्व-कल्याणकारी होने के नाते से सारे विश्व की सर्व आत्मायें आपके मस्तक में सदा समीप हैं। यहाँ बैठे भी चाहे कोई अमेरिका में या कितनी भी दूर रहने वाली आत्मा हो, सेकेण्ड में उस आत्मा को अपनी श्रेष्ठ भावना वा श्रेष्ठ कामना के आधार से शान्ति व शक्ति की रेज़ दे सकते हो। ऐसे मास्टर ज्ञान सूर्य विश्व को कल्याण की रोशनी दे सकते हो।..."

 

 

 

15.12.1979
"...तो सभी श्रीकृष्ण के साथ झूलेंगे ना! जब बाप के समान बनेंगे तभी बाप के साथ झूले में झूल सकेंगे। नहीं तो दूर बैठे देखने वाले बन जायेंगे! सदा साथ रहने वाले वहाँ भी साथ-साथ झूलते हैं। हरेक ने स्वर्ग जाने की टिकट बुक कर दी हैं!..."

 

 

 

09.01.1980
"...इस बार शिवरात्रि के दिन दो चित्रों को विशेष सजाओ - एक निराकार शिव का, दूसरा श्रीकृष्ण का। विशेष दोनों चित्रों को ऐसे सजाकर रखो जैसे किरणों का चित्र बनाते हो ना। शिव का भी किरणों वाला चित्र सजाया हुआ हो और श्रीकृष्ण का भी किरणों का चित्र सजाया हुआ हो। विशेष दोनों चित्रों की आकर्षण हो। कृष्ण के चित्र की महिमा अलग और शिव की महिमा अलग। कटाक्ष नहीं करो लेकिन दोनों के अन्तर को सिद्ध करो। ..."

 

 

 

18.01.1980
"...पहले कृष्ण पीछे राधे होगी ना। तो जन्मस्थान और उनकी स्थिति दोनों का सम्पूर्ण कार्य समाप्त कर पीछे जन्म होगा राधे का। इसलिए वह बड़ा वह छोटी हो जायेगी। जैसे यहाँ भी सेवा का भिन्न रूप में जन्म स्थान और स्थिति तैयार करने का भी वण्डरफुल पार्ट है। जैसे यहाँ भी कारोबार के निमित्त जगत् अम्बा के क्षेत्र में पहले जगत अम्बा धरनी बनाने गई और फिर बाप गये। ऐसे जगत अम्बा और मुरबी बच्चा विश्व किशोर साथी, सामना करने वाले थे। मैदान पर आगे सेवा में आने वाले रहे, वैसे ही अभी भी भिन्न रूप में कार्य के संस्कार वही हैं। दोनों स्थापना के जन्म की कहानी में हीरो पार्टधारी हैं। गर्भमहल तैयार करा रहे हैं। यहाँ भी तो कारोबार में निमित्त दोनों मूर्तियाँ रहीं। तो यह महल तैयार करने वाले भी ऐसे पॉवरफुल चाहिए। यहाँ स्थापना की तैयारी की और फिर वहाँ आप सबके लिए जो विशेष अष्ट रतन हैं, उनके लिए तैयारी कर रहे हैं, महल तैयार कर रहे हैं। जब तैयारी हो तब तो आत्मायें वहाँ जायेंगी ना। तो अब अपवित्र सृष्टि में पवित्र महल तैयार करना कितना श्रेष्ठ कार्य करना पड़े। ऐसी पॉवरफुल आत्मायें चाहिए जो यह पॉवरफुल कार्य कर सकें। ऐसी वैसी नहीं कर सकतीं। ..."

 

 

 

18.03.1981
"...जो सबसे ज्यादा संस्कार मिलाने की डान्स करता, बाप का सहयोगी बनता वही फर्स्ट जन्म में श्रीकृष्ण के साथ हाथ मिलाकर डान्स करेगा। डान्स करनी है ना? संस्कारों की रास मिलाने का सबसे सहज तरीका है - स्वयं नम्रचित बन जाओ..."

 

 

 

19.03.1981
"...चित्र भी देखा है ना कृष्ण के हाथ में गोला दिखाया है! तो एक कृष्ण अकेला थोड़े ही राज्य करेगा। आप सब भी साथ होंगे ना। तो आपका भी चित्र है। क्योंकि अधिकारी तो अब बनते हो। अभी के अधिकारीपन के संस्कार 21 जन्म तक चलेंगे।..."

 

 

 

23.03.1981
"...जैसे कृष्ण के चित्र में स्वर्ग हथेली पर है तो संगम पर भाग्य का गोला हाथ में है। इतने भाग्यवान हो। यह सेवा अभी साधारण बात लगती लेकिन यह साधारण नहीं है। यह वन्डरफुल लकीर है। जितना समय यह लाटरी मिलती है, इसी लाटरी को अविनाशी बना सकते हो। ऐसे अभ्यासी बन जाओ जो कहाँ भी रहते यहाँ जैसी स्थिति बना सको। ..."

 

 

03.04.1981
"...यहाँ आपकी बुद्धि भटकती है और भक्त पाँव से भटकेंगे। कब किसको देवता बनायेंगे, कब किसको। आज राम के भक्त होंगे, कल कृष्ण के बन जायेंगे। ‘‘सर्व प्राप्ति एक द्वारा'' - ऐसी स्थिति आपकी नहीं होगी तो भक्त आत्मायें भी हर प्राप्ति के लिए अलग-अलग देवता के पास भटकेंगे। आप अपनी श्रेष्ठ शान से परे हो जाते हो तो आपके भक्त भी परेशान होंगे। जैसे यहाँ आप याद द्वारा अलौकिक अनुभूतियाँ करने के बजाए अपनी कमजोरि यों के कारण प्राप्ति के बजाए उल्हनें देते हो। चाहे दिलशिकस्त हो उल्हनें देते, चाहे स्नेह से उल्हनें देते, तो आपके भक्त भी उल्हनें देते रहेंगे।..."

 

 

 

18.11.1981
"...जैसे ब्रह्मा बाप को देखा-सदा अपने सम्पूर्ण स्टेज और भविष्य प्रालब्ध अर्थात् फरिश्ता स्वरूप और देवपद स्वरूप दोनों ही सदा ऐसे स्पष्ट स्मृति में रहते थे जो सामने जाने वाले भी पुरूषार्थी स्वरूप होते हुए भी फरिश्ता रूप और भविष्य श्रीकृष्ण का रूप देखते और वर्णन करते थे। ऐसे बच्चों में भी सम्पूर्णता के समीप आने की निशानी स्वयं भी समीपता का अनुभव करेंगे और औरों को भी अनुभव होगा। ..."

 

 

 

29.12.1981
"...जो चित्र बनाया है वह एक का नहीं है, आप सबका है। अपना चित्र देखा है? समझते हो हम सबका चित्र है या एक श्रीकृष्ण का है? किसका है? आप सबका है कि नहीं? तो सदा याद रहता है कि आज ब्राह्मण और कल फरिश्ते से देवपदधारी बने कि बने? नालेज के दर्पण से अपना यह चित्र ‘‘फरिश्ता सो देवता'' सदा दिखाई देता है? जैसे अभी सबके दिल का आवाज सदा निकलता है, कौन सा? ‘‘मेरा बाबा''। ऐसे सदा नालेज के दर्पण में अपना चित्र देखते हुए यह आवाज निकलता है कि यह मेरा चित्र है? मेरा बाबा, मेरा चित्र! क्योंकि अभी अपने राज्य और राज्य करने के राज्य-अधिकारी स्वरूप के बहुत समीप आ रहे हो।..."

 

 

 

02.01.1982
"...जैसे आपके यादगार चित्र श्रीकृष्ण के चित्र में बचपन से ही ताज दिखाते हैं। बड़ा होकर तो होगा ही लेकिन बचपन से ही ताजधारी। देखा है अपना चित्र? डबल विदेशियों ने अपना चित्र देखा है? यह किसका चित्र है? एक ब्रह्मा का चित्र है या आप सबका है? तो जैसे श्रीकृष्ण के चित्र में बचपन से ही ताजधारी दिखाया है वैसे आप श्रेष्ठ आत्मायें भी मरजीवा बनीं, ब्राह्मण बनीं और जिम्मेवारी का ताज धारण किया। तो जन्म से ताजधारी बनते हो इसलिए यादगार में भी जन्म से ताज दिखाया है। तो ब्राह्मण बनना अर्थात् ताजपोशी का दिन मनाना। ..."

 

 

 

14.03.1982
"...बाप समान विश्व कल्याणकारी की बेहद की स्टेज में स्थित होना पड़े जब उस स्टेज में स्थित होंगे तो ऐसे अनुभव करेंगे जैसे चित्र दिखाते हो - ग्लोब के ऊपर श्रीकृष्ण बैठा हुआ है, ऐसे मैं विश्व के ग्लोब पर बैठा हूँ। तो आटोमेटिकली विश्व का चक्र लग जायेगा। जैसे बहुत ऊँचे स्थान पर चले जाते हो तो चक्कर लगाना नहीं पड़ता लेकिन एक स्थान पर रहते सारा दिखाई देता है। ऐसे जब टॉप की स्टेज पर, बीजरूप स्टेज पर, विश्व कल्याणकारी स्थिति में स्थित होंगे तो सारा विश्व ऐसे दिखाई देगा जैसे छोटा ‘बाल' है। तो सेकण्ड में चक्कर लगाकर आयेंगे क्योंकि ऊँची स्टेज पर रहेंगे। ..."

 

 

 

26.04.1982
"...सेकण्ड की हार सदा की हार है जो चन्द्रवंशी कमानधारी बना देती है और सेकण्ड की जीत सदा की खुशी प्राप्त कराती जिसकी निशानी श्रीकृष्ण को मुरली बजाते हुए दिखाया है। तो कहाँ चन्द्रवंशी कमानधारी और कहाँ मुरली बजाने वाले! ‘तो सेकण्ड की बात नहीं है लेकिन सेकण्ड का आधार सदा पर है'। तो इस राज़को समझते हुए सदा आगे चलते चलो।..."

 

 

 

03.01.1983
"...हम आत्मायें विश्व की ऐसी श्रेष्ठ विशेष आत्मायें बनेंगी, डायरेक्ट बाप से सम्बन्ध में आने वाली बनेंगी - ऐसा कब सोचा था! क्रिश्चियन से कृष्णपुरी में आ जायेंगे यह कभी सोचा था! धर्मपिता के फालोअर थे। तना के बजाए टाली में अटक गये। ..."

 

 

 

13.01.1983
"...जैसे आदिदेव ब्रह्मा और आदि आत्मा श्रीकृष्ण, दोनां का अन्तर दिखाते हो और दोनो को साथ-साथ दिखाते हो - ऐसे ही आप सब भी अपना ब्राहमण स्वरूप और देवता स्वरूप दोनों को सामने रखते हुए देखो कि आदि से अन्त तक हम कितनी श्रेष्ठ आत्मायें रही हैं। तो बहुत नशा और खुशी रहेगी। ..."

 

 

 

22.02.1984
"...अकेला ब्रह्मा सो कृष्ण बन जाए, तो अकेला क्या करेगा? साथ में पढ़ने वाले, खेलने वाले भी चाहिए ना। इसलिए ब्रह्मा बाप ब्राह्मणों प्रति बोले कि मुझ अव्यक्त रूपधारी बाप समान अव्यक्त रूपधारी, अव्यक्त स्थितिधारी फरिश्ता रूप बनो। फरिश्ता सो देवता बनेंगे। ..."

 

 

 

03.12.1984
"...अगर एक आधी कमज़ोरी रह जाती है तो प्राप्ति में भी आधा जन्म, एक जन्म पीछे आना पड़ता है। श्रीकृष्ण के साथ-साथ वा विश्व-महाराजन पहले लक्ष्मी-नारायण की रायल फैमली वा समीप के सम्बन्ध में आ नहीं सकेंगे। जैसे संवत् एक-एक-एक से शुरू होगा। ऐसे नया सम्बन्ध, नई प्रकृति, नम्बरवन नई आत्मायें, नई अर्थात् ऊपर से उतरी हुई नई आत्मायें, नया राज्य, यह नवीनता के समय का सुख, सतोप्रधान नम्बरवन प्रकृति का सुख नम्बरवन आत्मायें ही पा सकेंगी। नम्बरवन अर्थात् माया पर विन करने वाले। तो हिसाब पूरा होगा।..."

 

 

 

26.12.1984
सत्यता की शक्ति ...
"...सत्यता की शक्ति वाला इन सबको खुशी में नाचने की स्टेज बना देता है। तो यह चित्र किसका है? आप सभी का है ना! सभी कृष्ण बनने वाले हैं। इसी में हाथ उठाते हैं ना। राम के चरित्रों में ऐसी बातें नहीं हैं। उसका अभी-अभी वियोग अभी-अभी खुशी है। तो कृष्ण बनने वाली आत्मायें ऐसी स्थिति रूपी स्टेज पर सदा नाचती रहती हैं। कोई प्रकृति वा माया वा व्यक्ति, वैभव उसे हिला नहीं सकता। माया को ही अपनी स्टेज वा शैया बना देगा। यह भी चित्र देखा है ना। साँप को शैया बना दिया अर्थात् विजयी बन गये। तो सत्यता की शक्ति की निशानी सच तो नच यह चित्र है। सत्यता की शक्ति वाले कभी भी डूब नहीं सकते। सत्य की नईया डगमग खेल कर सकती है लेकिन डूब नहीं सकती। ..."

 

 

 

23.01.1985
"...जैसे ब्रह्मा बाप को देखा, अपना भविष्य चोला श्रीकृष्ण स्वरूप सदा सामने स्पष्ट रहा। ऐसे आप सभी को भी शक्तिशाली नेत्र से स्पष्ट और सामने दिखाई देता है? अभी-अभी फरिश्ता सो देवता। नशा भी है और साक्षात् देवता बनने का दिव्य नेत्र द्वारा साक्षात्कार भी है। तो ऐसा शक्तिशाली नेत्र है? ..."

 

 

 

18.02.1985
"...अगर समय लगाने में अलबेले रहे तो पहले नम्बर वाली आत्मा अर्थात् श्रीकृष्ण स्वरूप में स्वर्ग के पहले वर्ष में न आकर पीछे-पीछे नम्बरवार आयेंगे। यह है समय देने का महत्व। देते क्या हो और लेते क्या हो? इसलिए चारों ही बातों को सदा चेक करो तन-मन-धन, समय चारों ही जितना लगा सकते हैं उतना लगाते हैं? ऐसे तो नहीं जितना लगा सकते उतना नहीं लगाते? यथाशक्ति लगाने से प्राप्ति भी यथाशक्ति होगी। सम्पूर्ण नहीं होगी। ..."

 

 

 

24.03.1985
"...देखो नम्बरवन महान आत्मा बनने के कारण कृष्ण के रूप में नम्बरवन पूजा हो रही है। एक ही यह महान आत्मा है जिसकी बाल रूप में भी पूजा है। बाल रूप भी देखा है ना। और युवा रूप में राधे कृष्ण के रूप में भी पूजा है। और तीसरा गोप गोपियों के रूप में भी गायन पूजन है। चौथा लक्ष्मी नारायण के रूप में। एक यह ही महान आत्मा है जिसके भिन्न-भिन्न आयु के रूप में भिन्न-भिन्न चरित्र के रूप में गायन और पूजन है। राधे का गायन है लेकिन राधे को बाल रूप में कभी झूला नहीं झुलायेंगे। कृष्ण को झुलाते हैं। प्यार कृष्ण को करते हैं। राधे का साथ के कारण नाम जरूर है। फिर भी नम्बर दो और एक में फर्क तो होगा ना। तो नम्बरवन बनने का कारण क्या बना? - ‘‘महा पुण्य’’। महान पुण्य आत्मा सो महान पूज्य आत्मा बन गई। ..."

 

 

 

30.03.1985
"...जैसे कृष्ण को बचपन से ताज दिखाते हैं तो यादगार में भी बचपन से ताजधारी रूप से पूजते हैं। और सब साथी हैं लेकिन आप ताजधारी हो। साथ तो सभी निभाते लेकिन समान रूप में साथ निभाना। इसमें अन्तर है।..."

 

 

 

11.04.1985
"...जैसे चित्र बनाते हैं ना - एक ही चित्र में अभी-अभी ब्रह्मा देखे अभी-अभी कृष्ण देखो, विष्णु देखो। ऐसे आपका साक्षात्कार हो। अभी-अभी फरिश्ता, अभी-अभी विश्व-महाराजन विश्वमहारानी रूप। अभी-अभी साधारण सफेद वस्त्रधारी। यह भिन्न-भिन्न स्वरूप आपके इस गोल्डन मूर्त्त से दिखाई दें। ..."

 

 

 

11.11.1985
"...जैसे शुरू में चलते-फिरते साक्षात्कार मूर्त्त देखते थे। ब्रह्मा को नहीं देखते थे, कृष्ण को देखते थे। कृष्ण पर मोहित हुए ना! ब्रह्मा पर तो नहीं हुए। ब्रह्मा गुम होकर कृष्ण दिखाई देता था तब तो भागे ना! कृष्ण ने भगाया यह तो राइट है। क्योंकि ब्रह्मा को ब्रह्मा नहीं देखते कृष्ण देखते थे। तो यह साक्षात्कार स्वरूप हुआ ना! उसी ने इतना मस्त बनाया, भगाया। साक्षात्कार ने ही सब कुछ छुड़ाया। भक्ति का साक्षात्कार सिर्फ देखने का होता है। लेकिन ज्ञान का होता है देखने के साथ पाना - यही अन्तर है। सिर्फ देखा नहीं, पाया। कृष्ण हमारा है, हम गोपियाँ हैं, इसी नशे ने स्थापना कराई। हम वही हैं, हमारे ही चित्र हैं। तो ऐसे ही साक्षात्कार द्वारा अभी भी सेवा हो। ..."

 

 

 

25.11.1985
"... जैसे श्रीकृष्ण के लिए दिखाते हैं कि उसने साँप को भी जीता। उसके सिर पर पाँव रखकर नाचा। तो यह आपका चित्र है। कितने भी जहरीले साँप हों लेकिन आप उन पर भी विजय प्राप्त कर नाच करने वाले हो। यही श्रेष्ठ शक्तिशाली स्मृति सबको समर्थ बना देगी। ..."

 

 

 

18.02.1986
"... आदि में ब्रह्मा बाप चलते-फिरते साधारण दिखते थे वा कृष्ण रूप मे दिखाई देते थे? साधारण रूप देखते भी नहीं दिखाई देता था यह अनुभव है ना! दादा है यह सोचते थे? चलते-फिरते कृष्ण ही अनुभव करते थे। ऐसे किया ना? आदि में ब्रह्मा बाप मे यह विशेषता देखी, अनुभव की और सेवा की आदि में जब भी जहाँ भी गये, सबने देवियाँ ही अनुभव किया। देवियाँ आई हैं, यही सबके बोल सुनते, यही सभी के मुख से निकलता कि यह अलौकिक शक्तियां हैं। ऐसे ही अनुभव किया ना? यह देवियों की भावना सभी को आकर्षित कर सेवा की वृद्धि के निमित्त बनी। तो आदि में भी न्यारेपन की विशेषता रही। सेवा की आदि में भी न्यारेपन की, देवी पन की विशेषता रही। अभी अन्त में वही झलक और फलक प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करेंगे। तब प्रत्यक्षता के नगाड़े बजेंगे। ..."

 

 

 

31.03.1986
"...खुद कितना भी झुकना पड़े लेकिन यह झुकना सदा के लिए झूलों में झूलना है। जैसे श्रीकृष्ण को कितना प्यार से झुलाते रहते हैं। ऐसे अभी बाप तुम बच्चों को अपनी गोदी के झूले में झुलायेंगे और भविष्य में रत्न जड़ित झूलों में झूलेंगे, और भक्ति में पूज्य बन झुले में झूलेंगे। तो ‘झुकना-मिटना यह महानता है।’ मैं क्यों झुकूँ, यह झुकें, इसमें अपने को कम नहीं समझो। यह झुकना महानता है। यह मरना, मरना नहीं, अविनाशी प्राप्तियों में जीना है।..."

 

 

 

09.04.1986
"...जैसे स्थापना के आदि में अनुभव किया है कि चारों ओर ब्रह्मा और कृष्ण के साक्षात्कार की लहर फैलती गई। यह कौन है? यह क्या दिखाई देता है? यह समझने के लिए बहुतों का अटेन्शन गया। ऐसे अब अन्त में चारों ओर यह दोनों रूप ‘ज्योति और फरिश्ता’ उसमें बापदादा और बच्चे सबकी झलक दिखाई देगी। और सभी का एक से अनेकों का इसी तरफ स्वत: ही अटेन्शन जायेगा। अभी यह दिव्य दृश्य आप सबके सम्पन्न बनने तक रहा हुआ है।..."

 

 

 

05.10.1987
"...पावन करने वाली भक्तिमार्ग की गंगा नदी भी वहाँ है और भक्ति के हिसाब से कृष्ण की भूमि भी यू.पी. में ही है। भूमि की महिमा बहुत है। कृष्ण लीला, जन्मभूमि देखनी होगी तो भी यू.पी. में ही जायेंगे। तो यू.पी. वालों की विशेषता है। सदा पावन बन और पावन बनाने की विशेषता सम्पन्न हैं। ..."

 

 

 

21.10.1987
"... सिर्फ कृष्ण छोटे बच्चे को रानियाँ दिखा दी हैं। कृष्ण को बच्चे के रूप में भी दिखाते, फिर रानियाँ भी दिखाते। मिक्स कर दिया है। यह राजाओं का राजा बनाने वाले की सब रानियाँ हैं। रानियाँ भी हो, सीतायें भी हो। यही जादू है। अभी-अभी कहते भाई-भाई हो, तो जरूर अपने को भाई ही कहेंगे। फिर दूसरे तरफ कहते सब सीतायें हो, राम कोई नहीं। यही जादू है। इसमें ही मजा है। अभी-अभी बहन-भाई बन जाओ, अभी-अभी सीता बन जाओ, अभी फरिश्ता बन जाओ। यह रूहानी जादू बहुत रमणीक है। जादू से घबराते तो नहीं हो ना।..."

 

 

30.01.1988
"...पहली देव आत्मा श्रीकृष्ण के रूप में ब्रह्मा ही बनते हैं, इसलिए नई सृष्टि के आदि का आदि - देव कहा जाता है। संगमयुग में भी आदि रचना का पहला नम्बर अर्थात् आदि देव कहो वा ब्राह्मण आत्माओं के रचता ब्रह्मा कहो। तो संगम पर और सृष्टि के आदि पर - दोनों समय के आदि हैं, इसलिए आदि - देव कहा जाता है।..."

 

 

23.03.1988
"...एक गीत गाओ तो दूसरे गीत स्वत: ही समाप्त हो जायेंगे। सिर्फ दो शब्दों में खुशखबरी सुनाओ - ओ.के.। रूह - रूहान करो। और गीत सुनाने लिए टाइम न दो, न लो। खुशखबरी सुनाने में समय नहीं लगता है लेकिन रामकथा सुनाने में टाइम लगता है। बापदादा ऐसी बातों को राम - कथा कहते हैं, कृष्ण कथा नहीं कहते। यह 14 कला वालों की कथा है, 16 कला वालों की नहीं। राम - कथा करने वाले तो नहीं हो ना?..."

 

 

 

10.01.1990
"...योगबल की पैदाइश का नया चैप्टर शुरू करने के लिए कौन-सी आत्मायें चाहिए? योगी आत्माएं चाहिए ना! निमित्त बहाना कोई भी बन जाता है, लेकिन चुक्तू भी होना है और सेवा भी होनी है । अभी यह नहीं सोचना कि कृष्ण को जन्म कौन देगा, राधे को कौन जन्म देगा। इस विस्तार में नहीं जाना । यह कोई टापिक नहीं है। इसलिए कहा कि कर्मों की लीला 'वाह-वाह' है, बाकी जन्म कोई भी दे - इनमें नहीं जाना। ..."

 

 

 

16.03.1992
"...बाप के सम्बन्ध में भी कितना मूँझते रहे? कृष्ण है, हनूमान है, राम है ...कोन है बाप? मूँझते रहे ना! अपने भाग्य में भी मूँझते रहे। हम तो हैं ही चरणों की धूल। यही मानते रहे ना। बाप के परिचय में भी मूँझते रहे तो व्यवहार में भी मूँझते रहे, परिवार में भी मूँझते रहे। लेकिन अभी मौज। अभी किसी भी बात में मूँझने का मार्जिन ही नहीं है। त्रिकालदर्शी आत्मा कभी भी किसी बात में मूँझ नहीं सकती। तीनों काल क्लीयर हैं। जब मंजिल और रास्ता क्लीयर होता है तो कोई मूँझता नहीं।..."

 

 

 

12.11.1992
राजस्थान के राज्यपाल डॉ.एम.चन्ना रेड्डीजी से मुलाकात
"...कोई भी कार्य करो लेकिन यह याद रखो कि ‘मेरा बाबा’ और बाबा का यह कार्य कर रही हूँ। ट्रस्टी होकर कार्य करो। तो ट्रस्टी को कभी कोई बोझ नहीं होता है। न बोझ होगा, न भूलेंगे। फिर भी भक्ति में याद तो किया है ना। याद का रिटर्न है-मौज में रहना। (कृष्ण की भक्त है) तो कृष्ण के राज्य में चलना है ना। तो अभी चलेंगी? ये सब आपको लेकर ही जायेंगे, कोई छोड़कर नहीं जायेंगे। फिर भी दोनों के अच्छे विचार हैं। अच्छा!..."

 

 

 

31.12.1992
"...ब्रह्मा बाप का स्नेह किससे रहा? मुरली से। सबसे ज्यादा प्यार मुरली से रहा ना तब तो मुरलीधर बना। भविष्य में भी इसलिए मुरलीधर बना। मुरली से प्यार रहा तो भविष्य श्रीकृष्ण रूप में भी ‘मुरली’ निशानी दिखाते हैं। तो जिससे बाप का प्यार रहा उससे प्यार रहना-यह है प्यार की निशानी।..."

 

 

 

13.11.1997
"...जैसे आदि में ब्रह्मा बाप को साधारण न देख कृष्ण के रूप में अनुभव करते थे। साक्षात्कार अलग चीज़ है लेकिन साक्षात स्वरूप में कृष्ण ही देखते, खाते-पीते चलते थे। ऐसा है ना? तो स्थापना में एक बाप ने किया, अन्त में आप बच्चे भी आत्माओं के आगे साक्षात देवी-देवता दिखाई देंगे। वह समझेंगे ही नहीं कि यह कोई साधारण हैं। वही पूज्यपन का प्रभाव अनुभव करेंगे, तब बाप सहित आप सभी के प्रत्यक्षता का पर्दा खुलेगा। ..."

 

 

 

18.01.1998
"...जैसे चित्रों में दिखाते हैं ना - उन्होंने एक-एक गोपी के साथ कृष्ण को दिखा दिया लेकिन यह इस समय का गायन है। अब अव्यक्त रूप में हर बच्चे के साथ जब चाहे, चाहे रात को दो बजे, अढ़ाई बजे हैं, किसी भी टाइम साथ निभाते रहते हैं। साकार में तो सेन्टर्स पर चक्कर लगाना कभी-कभी होता लेकिन अब अव्यक्त रूप में तो पवित्र प्रवृत्ति में भी चक्कर लगाते हैं। बाप को काम ही क्या है, बच्चों को समान बना के साथ ले जाना, यही तो काम है ना और क्या है? तो इसी में ही बिजी रहते हैं।..."

 

 

 

12.12.1998
"...आप ब्राह्मणों की निशानी दुनिया वालों ने कृष्ण रूप में दिखा दी है। लेकिन वह विश्व का राजकुमार है इसलिए राज्य की निशानी तिलक, ताज, तख़्त देते हैं। फिर भी उसको छोटे-पन में तिलक ताज, तख्त नहीं मिलता लेकिन आप ब्राह्मणों को तिलक, ताज और तख़्त तीनों ही प्राप्त होता है। परमात्म-बाप द्वारा यह तीनों प्राप्तियाँ होना यह सिर्फ ब्राह्मणों के भाग्य में है। ..."

 

 

 

30.03.2000
"...कृष्ण की सखी बनेंगी? (बहन बनेंगी) अच्छा है ना? (बाबा पर्सनल सामने वालों से पूछ रहे हैं) अगर यहाँ साथ हैं तो वायदा है वहाँ भी रहेंगी, बाप वायदा देते हैं। अगर यहाँ हैं तो वहाँ गैरन्टी हैं। यह सभी साथ रहेंगे या दूर-दूर रहेंगे? कभी-कभी मिलने आयेंगे! श्रीकृष्ण के साथ पढ़ना, साथ रास करना, साथ घूमना... पाण्डव भी रास करेंगे या सिर्फ बहनें ही करेंगी? दोनों को चांस है, जो चाहे वह कर सकता है क्योंकि अभी सीट फिक्स नहीं हुई है। सिर्फ दो सीट फिक्स हैं। 3-4 से खाली हैं। एनाउन्स नहीं हुई हैं। नम्बर ले सकते हो।..."

 

 

31.12.2001
"...आम जनता के लिए गीता का भगवान कोई भी हो, कृष्ण हो या निराकार हो। कोई ऐसे अथॉरिटी वाले बोलें, सिद्ध करें, कि हाँ आपकी यह बात बहुत आवश्यक है, ऐसा ग्रुप बनाओ। बना सकते हैं कोई बड़ी बात नहीं है। धार्मिक संस्था, जो आपका धार्मिक वर्ग है और जो जस्टिस हैं, वकील हैं, ऐसे धर्म क्षेत्र वालों का ग्रुप बनाओ जो विशेष निमित्त हो।..."

 

 

31.12.2001
"...दिल्ली तथा सोनीपत के भवन निर्माण प्रति बापदादा के इशारे
सभी ब्राह्मण परिवार के समाचार, पत्रों द्वारा समाचार तो सब सुनते रहते हैं। तो आजकल सबके संकल्प में, सहयोग में क्या याद रहता है? कि हमारी राजधानी में, आप सबकी राजधानी कौन-सी है? मधुबन है घर और राज्य कहाँ करना है? दिल्ली में करना है, मधुबन में नहीं। मधुबन में कृष्ण का महल बनेगा या दिल्ली में बनेगा? मधुबन में नहीं बनेगा? तो राजधानी याद रहती है, सभी को राजधानी याद है? तो सभी के सहयोग से अभी राजधानी में विशेष सेवास्थान बन रहा है, आप सबने बीज डाला है? सभी ने डाला है? क्योंकि बीज डालेंगे तभी फल खायेंगे ना। बिना बीज डालने के फल कैसे खायेंगे। तो सभी ने बीज डाला है और भी डालते रहेंगे क्योंकि इस बीज से अनेक प्रकार के प्रत्यक्षता के फल निकलेंगे। इसलिए सबको अपने-अपने तरफ से सफलता वर्ष में सब सफल करना ही है। सर्व खज़ाने सफल करना है। उसके साथ बीज भी डालना है, डालते रहते हैं, डालते रहेंगे। ठीक है ना! डालते रहेंगे ना! हाथ उठाओ कि समझते हैं पूरा हो गया? जब तक सेवा है तो सेवा में बीज डालते जाओ और फिर फल भी आप सबको खाना है। जब प्रत्यक्षता का फल निकलेगा ना तो आप सब खायेंगे, सिर्फ दिल्ली वाले नहीं सब खायेंगे। बापदादा से प्यार है ना! तो सेवा से भी प्यार है। तो सेवा का फल भी बहुत प्यारा है। मानेसर की धरनी के सेवाधारी कौन-कौन आये हैं, वह उठो। अच्छा है, काम ठीक चल रहा है? ठीक चल रहा है और ठीक चलता रहेगा। बाप के सेवास्थानों को बाप का वरदान मिला हुआ ही है। होना ही है। सर्व के सहयोग से सेवा सफल होनी ही है। ठीक है ना! अच्छा है। जैसे उमंग-उत्साह से बेहद की वृत्ति से स्थान बना है, ऐसे ही बेहद की वृत्ति, दृष्टि और सेवा से सफलता भी बेहद की मिलनी है। सब बेहद होना है। तो बेहद में तो आप सभी हो ना! ऐसे कभी नहीं समझना यह दिल्ली का है, हमारा है क्योंकि प्रत्यक्षता का बीज आप सबका है। निमित्त दिल्ली है लेकिन फल आप सबको खाना है, मिल के खायेंगे। इसलिए बापदादा को भी खुशी है कि बेहद के उमंग-उत्साह से बेहद की सेवा बढ़ रही है, बढ़ती जायेगी। अच्छा। सोनीपत का भी तैयार होना है। वह भी दिल्ली है ना, चाहे कोई भी है, है तो दिल्ली ही। ..."

 

 

28.03.2002
"...अच्छा एक सेकण्ड में अपना भविष्य चित्र सामने ला सकते हो? चलो कृष्ण नहीं बनेंगे, लेकिन साथी तो बनेंगे ना! कितना प्यारा लगता है। आार्टिस्ट बनना आता है या नहीं आता है? बस सामने देखो। अभी साधारण हूँ, कल (ड्रामा का कल, यह कल नहीं जो कल आयेगा) तो कल यह पवित्र शरीरधारी बनना ही है। ..."

 

 

30.11.2004
"...जैसे ब्रह्मा बाप में देखा - साधारण तन में होते भी आदि के समय भी ब्रह्मा बाप में क्या दिखाई देता था, कृष्ण दिखाई देता था ना। आदि वालों को अनुभव है ना! तो जैसे आदि में ब्रह्मा बाप द्वारा कृष्ण दिखाई देता था ऐसे ही लास्ट में क्या दिखाई देता था? अव्यक्त रूप दिखाई देता था ना! चलन में, चेहरे में दिखाई दिया ना! अभी बापदादा विशेष निमित्त बच्चों को यह होमवर्क दे रहा है कि अभी ब्रह्मा बाप समान अव्यक्त रूप दिखाई दे। चलन और चेहरे से कम से कम 108 माला के दाने तो दिखाई देवे। बापदादा नाम नहीं चाहते हैं, नाम नहीं बताते हैं - 108 कौन हैं लेकिन उनकी चलन और चेहरा स्वत: ही प्रत्यक्ष हो। यह होमवर्क बापदादा निमित्त बच्चों को विशेष दे रहा है। ..."

 

 

15.12.2008
"...जो समझता है कि अपने राज्य के फर्स्ट जन्म में श्रीकृष्ण के साथ-साथ हमारा भी पार्ट हो, वह हाथ उठाओ। अच्छा पार्ट फर्स्ट में? हाथ देख करके तो खुश हो गये। ताली बजाओ। लेकिन फर्स्ट जन्म में आओ उसकी मुबारक है। लेकिन कहें क्या... नहीं कहें, आना ही है फर्स्ट, फिर दूसरी बात क्यों कहें। अच्छा है, जितने भी आये हैं फर्स्ट जन्म में आना ही है। ताली तो बजा दी, फर्स्ट जन्म और फर्स्ट स्टेज भी। तो फर्स्ट स्टेज बनानी ही है, यह जिसका दृढ़ संकल्प है, फास्ट जाना ही है, चाहे कुछ भी विघ्न हो लेकिन विघ्न, विघ्न नहीं रहे, विघ्न विनाशक के आगे विजय का रूप बदल जाये क्योंकि आप सभी विघ्न विनाशक हो। ..."

 

 


31.01.2014
"...यह आवाज निकले कि ब्रह्माकुमारियां कृष्ण के बजाए शिव कहती हैं। यह आवाज निकले। यह पंजाब की सेवा है। तो यह आवाज निकलना चाहिए ना। पंजाब को प्राइज देंगे अगर यह आवाज निकालेंगे। चाहे माने नहीं माने लेकिन यह तो कहें इन्हों का यह मत है। और इस पर सभी का सोच चले। करो कोई कमाल।..."