13-07-2018 प्रात: मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - सिर्फ दो अक्षर याद करो - हम हैं सतगुरू पोत्रे जो ब्रह्मा बाप द्वारा दादे का वर्सा लेते हैं''


प्रश्नः-

चढ़े तो चाखे वैकुण्ठ रस...यह गायन तुम बच्चों से लगता, दूसरों से नहीं - क्यों?


उत्तर:-

क्योंकि तुम्हारे सामने जबरदस्त मंजिल है। तुम बाप के पास परमधाम घर जाते हो, फिर नई दुनिया में आते हो। दूसरे किसी के लिए भी यह गायन नहीं हो सकता है। भल उनमें भी कच्चे-पक्के नम्बरवार होते हैं लेकिन उनके सामने मंजिल नहीं होती। वह वैकुण्ठ रस को जानते भी नहीं। तुम बच्चे ही कहते हो अब हमें उन राहों पर चलना है जहाँ गिरना और सम्भलना है।


गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है....

ओम् शान्ति। जब गीत बजता है तो बच्चे समझते हैं कि हमारे लिए इनमें भी ज्ञान है। अज्ञानी मनुष्य के लिए अज्ञान है। ज्ञानी तू आत्मा के लिए ज्ञान है। समझते हो बरोबर माया के तूफान ही गिराते हैं फिर ईश्वर बाप चढ़ाते हैं अर्थात् गिरे हुए को ज्ञान की संजीवनी बूटी देते हैं। अगर कोई काम के तूफान में आ जाते हैं तो गिर जाते हैं फिर क्रोध का भी तूफान लगता है तो गिरना होता है। यह गिरना और चढ़ना होता है। चढ़े तो चाखे वैकुण्ठ रस........ अब यह गीत सिवाए तुम्हारे और किसके साथ लग नहीं सकता। सन्यासियों से भी नहीं लग सकता। भल उन्हों के पास भी कच्चे सन्यासी होंगे परन्तु उन्हों की कोई मंजिल नहीं है। तुम्हारी तो बड़े ते बड़ी जबरदस्त मंजिल है। वह करके शास्त्र आदि पढ़कर विद्वान बन जाते हैं। बाकी राजाई आदि की कोई मंजिल नहीं, इसमें बड़ी ऊंच मंजिल है। बच्चे जानते हैं बेहद का बापदादा पढ़ाते हैं। मम्मा भी पढ़ाती फिर बच्चे भी पढ़ाते हैं। तुम हो दादे पोत्रे। अमृतसर में दादे पोत्रे होते हैं फिर कहेंगे यह सातवीं पीढ़ी है, यह दूसरी पीढ़ी है। तुम समझते हो सतयुग में भी पीढ़ी चलती है देवताओं की। पहली पीढ़ी, दूसरी पीढ़ी........ यहाँ फिर तुम्हारी पीढ़ियां नहीं। एक दादा, एक बाबा, एक मम्मा और बच्चे-बच्चियां। बस, दादे पोत्रे से आगे कुछ नहीं कहेंगे। अब यह याद करना तो अति सहज है। हम ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। ब्रह्मा हुआ हमारा बाबा। दादा है शिव। उनसे मिलकियत मिलती है। कितनी सहज बात है। हम दादे पोत्रियाँ ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। ब्रह्मा एक ही बच्चा है शिव का। ऐसे नहीं कहेंगे कि हम विष्णु कुमारी अथवा शंकर कुमारी हैं। प्रजापिता एक ही ब्रह्मा को कहा जाता है। बाबा बहुत सहज समझाते हैं। ब्रह्माकुमार-कुमारियां। तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी बने हो - शिवबाबा से वर्सा लेने लिए। शिवबाबा कहते हैं ऐसे-ऐसे कोई को समझाओ। याद जरूर शिवबाबा को करना है, जिससे वर्सा मिलता है। और कोई को याद करेंगे तो नर्क का वर्सा मिलेगा - यह तो समझ की बात है। वर्सा बाप से नहीं, दादे से मिलता है।

स्वर्ग का रचयिता ज्ञान दाता वह है। शिवबाबा सुनाते हैं ब्रह्मा द्वारा, फिर यह ब्रह्मा भी सुन लेते हैं। ब्रह्मा की भी पहली-पहली बच्ची सरस्वती गाई हुई है। ब्रह्माकुमारी सरस्वती जगत अम्बा कितनी गाई हुई है! शिवबाबा से ब्रह्मा से भी जास्ती वर्सा लेती है इसलिए पहले लक्ष्मी फिर नारायण गाया जाता है। तुम जानते हो हम जगत अम्बा और जगतपिता के बच्चे ठहरे, तो क्यों नहीं दादा से वर्सा ले लेंवे? हम ब्रह्माकुमार-कुमारियां दादे, पोत्रे, पोत्रियां हैं, बस। दूसरी-तीसरी पीढ़ी नहीं है, परपोत्रे तरपोत्रे कुछ नहीं। दादे को कौन याद नहीं करेगा? तुम जानते हो हम जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। तुम कोई को भी समझा सकते हो शिव परमपिता परमात्मा स्वर्ग का रचयिता है। बरोबर रचते हैं ब्रह्मा द्वारा, फिर ब्रह्माकुमार-कुमारी को ब्रह्मा द्वारा कहते हैं कि मुझे और वर्से (स्वर्ग) को याद करो। देह के सब सम्बन्धों को भूल जाओ। कहा जाता है ना - आप मुये मर गई दुनिया। आत्मा शरीर से अलग हो जाती है तो कुछ भी नहीं रहता। देह का अभिमान निकल जाता है। हम बाबा के पास आये हैं, फिर हम गोरा बनेंगे। अभी श्याम हैं। श्याम और सुन्दर बनने का यह नाटक है। आत्मा प्योर हसीन बनती है। अभी तुम्हारी आत्मा आइरन एजड बन गई है, तो शरीर भी ऐसे हैं। सतयुग में तुम गोरे थे। एक हसीन मुसाफिर आते हैं गोरा बनाने। उनकी आत्मा तो सदैव गोरी है। कभी खाद नहीं पड़ती है क्योंकि वह जन्म-मरण में नहीं आते हैं। कितना सहज कर समझाते हैं! फिर भी ऐसे दादे को भूल कर फ़ारकती दे देते हैं इसलिए बाबा कहते हैं महान् से महान् मूर्ख और फिर सयाने से सयाने देखने हो तो यहाँ देखो। मूर्ख भी ऐसे हैं जो अति सहज दो बातें भी समझ नहीं सकते। सिर्फ समझना है - हम आत्मा हैं, वह निराकार परमात्मा हमारा दादा है। यह प्रजापिता ब्रह्मा तो नामीग्रामी है। उन द्वारा शिवबाबा वर्सा देते हैं। ब्रह्मा को छोड़ा, दादे को भी छोड़ा तो वर्सा खत्म हो जायेगा। बाबा कितना सहज करके समझाते हैं! हम हैं ब्रह्माकुमार-कुमारियां। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर हैं सूक्ष्मवतनवासी। उसमें भी ब्रह्मा को प्रजापिता कहते हैं। सूक्ष्मवतन में तो मनुष्य सृष्टि नहीं रची जाती। शंकर वा विष्णु को प्रजापिता नहीं कह सकते। प्रजा का पिता तो जरूर यहाँ होगा। ब्रह्मा के मुख कमल से ब्राह्मण निकले। ब्राह्मणों से पूछो - तुम किसकी वंशावली हो? यह सिर्फ गायन हो गया है, बाकी ऐसे है नहीं।

अभी तुम जानते हो परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा देवता, क्षत्रिय धर्म स्थापन करते हैं सो तो करेंगे संगमयुग पर। संगमयुग पर ब्राह्मण जरूर चाहिए। कलियुग अन्त में हैं शूद्र। तुम बच्चों को कितना अच्छी रीति समझाया जाता है! श्रीमत तो मशहूर है। श्रीमत भगवत गीता। उनसे क्या सुनना होता है? श्री श्री ने ज्ञान सुनाया होगा, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनाया होगा। अभी तुम प्रैक्टिकल में बी.के. बने हो। तुम कहते हो - बापदादा, हम कल्प पहले भी आपसे मिले थे। हम दादे से अपना वर्सा लेने लिए आये हैं। अच्छा, उससे क्या बने थे - सूर्यवंशी वा चन्द्रवंशी? श्री नारायण को वरा था या श्री राम को? कहते हैं - बाबा, हम तो श्री नारायण को वरेंगे। परन्तु फिर भूल जाते हैं, जो इतना लायक बनाते हैं उनको भूल जाते हैं। दादे को व बाप को शल कोई भी न भूले। झट फ़ारकती दे देते हैं, याद नहीं करते हैं। ज्ञान के दो अक्षर धारण नहीं करते। हम सतगुरू पोत्रे अथवा दादे पोत्रे हैं। उनसे वर्सा लेते हैं पुरुषार्थ से। लौकिक बाप का वर्सा अथवा प्रापर्टी तो बांटी जाती है। यहाँ बांटने की चीज़ नहीं, इसमें तो पुरुषार्थ करना पड़ता है। कोई मून आदि में प्लाट नहीं खरीद करना है। यहाँ तो राजाई के मालिक बनते हो। पार्ट तो यहाँ ही बजाना है। मून आदि में नहीं जाना है, इसको साइन्स घमण्ड कहा जाता है। अति घमण्ड में जाने से विनाश को प्राप्त करते हैं। क्या-क्या निकल पड़ा है! हजारों-लाखों माइल तक जाते हैं। उन्हों को मालूम पड़ता है - अभी यह कहाँ तक पहुँचा है? ऊपर चन्द्रमा में क्या है? चन्दमा तो शीतल है ना। सूर्य के आगे जाने से तप जायेंगे। कितना साइन्स घमण्ड है। नाम भी रखा है रॉकेट। बाबा ने समझाया है - आत्मा सबसे बड़ा रॉकेट है। है तो एक ही बिन्दी। उसका क्या वज़न होगा? बिन्दी में कितनी सारी नॉलेज है! एक सेकेण्ड में कहाँ से कहाँ उड़ जाती है। बाबा को याद किया और सेकेण्ड में उड़े। यह भी शुरूड (तीक्ष्ण) बुद्धि ही समझकर समझा सकते हैं। शिवबाबा भी बिन्दी है। लिंग स्वरूप कहने से कहेंगे इतनी बड़ी आत्मा तो होती नहीं, न परमात्मा ही ऐसा होता। वह फिर कहते हैं - परमात्मा तो ब्रह्म है। कुछ भी समझ न सकें। जब तक कोई सम्मुख न आये तब तक परमात्मा के नाम-रूप आदि को समझ न सके। हम भल शिवबाबा का चित्र दिखाते हैं परन्तु ऐसा है नहीं। वह तो बिन्दी रूप है, लेकिन बिन्दी की पूजा कैसे करेंगे, फूल आदि कैसे चढ़ायेंगे? तो यह भक्ति मार्ग चला आया है, पूजा के लिए मन्दिर में बड़ा रूप बना दिया है।

अच्छा, बाबा कहते हैं किसकी बुद्धि में यह ज्ञान न बैठे फिर भी यह तो समझ सकते हो ना कि हम ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं, दादे पोत्रे हैं। ऊंच ते ऊंच शिव भगवान् है। उनकी रचना को तो गॉड फादर नहीं कहेंगे। हम हैं उनके पोत्रे। वह कहते हैं मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। तुम भी जानते हो हम अभी तमोप्रधान सांवरे हैं। बाबा से सतोप्रधान गोरे बन रहे हैं। राम भी गोरा था। परन्तु कृष्ण से दो कला कम। वह भी अब काला हो गया है। कृष्ण के लिए तो कहते हैं सर्प ने डसा। लेकिन ऐसी कोई बातें हैं नहीं। यह तो काम चिता पर चढ़ने से काले बन जाते हैं। श्याम और सुन्दर बनते हैं। अब फिर सतोप्रधान बनने लिए बाप को याद करना है। एक मुसाफिर कितने को हसीन बनाते हैं, विश्व का मालिक बनाते हैं! सिर्फ कहते हैं - मुझ बाप को याद करो। नहीं तो वर्सा कैसे मिलेगा? विकर्म विनाश के लिए योग अग्नि चाहिए। घड़ी-घड़ी याद करना है। कई समझते हैं - हम बच्चे तो हैं ना। परन्तु सारा दिन याद नहीं करेंगे तो विकर्म विनाश नहीं होंगे, खुशी का पारा नहीं चढ़ेगा। 20-25 वर्ष वालों को भी यह बात बुद्धि में नहीं बैठती। भूल जाते हैं। फिर पुरानी दुनिया में जाकर तकदीर को लकीर लगा देते हैं। माँ-बाप की गोद में आने से ही तकदीर शुरू होती है। मम्मा-बाबा कहने से स्वर्ग के ह़कदार तो बने ना। प्रजा भी कहती है ना - हमारा हिन्दुस्तान सबसे ऊंचा। अरे, सबसे ऊंच होता तो फिर कर्जा क्यों उठाते, कंगाल क्यों बनते? यहाँ से बहुत धन ले गये हैं। कारखानों से पैदाइस होती है। कारखाना न निकालें तो कोई को नौकरी न मिल सके। नौकरी न मिले तो पालना कैसे करें? दु:खी हो पड़े हैं इसलिए भारत के लिए कितनी युक्ति रची हुई है। बच्चों को बहुत दु:ख न हो उसके लिए यह युक्ति है। यहाँ से कितने बाहर जाते हैं नौकरी करने, क्योंकि वहाँ पैसे बहुत मिलते हैं। बाप कहते हैं हमारा तो कांटों पर भी प्यार है। सब पतितों को आकर पावन करता हूँ। कांटों पर भी प्यार है तो कांटों से जो फूल बनते हैं उन पर भी प्यार है। ड्रामा अनुसार सबको सद्गति देता हूँ। सबका सद्गति दाता राम........ तो सबका प्यारा हुआ ना। उसमें कांटे भी हैं, फूल भी हैं। कायदे अनुसार स्वर्ग की स्थापना होती है तो उसके लिए लायक भी बनाते हैं। कहते हैं ना - पतित-पावन आओ, आकर पावन बनाओ। अभी तुम जानते हो पतित-पावन बाप आया है। भारत को ख़ास और दुनिया को आम पावन बनाते हैं। सर्वोदया लीडर नाम रखाया है। यह भी अपने पर नाम रख दिया है, जैसे श्री श्री 108 कहलाते हैं। सर्व माना सब। कोई भी मनुष्य तो सबकी सद्गति कर न सके। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) देहभान को भूलने के लिए जीते जी मरना है। आप मुये मर गई दुनिया। बार-बार इस देह से न्यारा होने की प्रैक्टिस करनी है।

2) हम दादे पोत्रे हैं। हमें लायक बन उनसे पूरा-पूरा वर्सा लेना है। आत्मा को योगबल से पावन बनाना है। खुशी में रहना है।

 

वरदान:-

बाप के कदम पर कदम रखते हुए परमात्म दुआयें प्राप्त करने वाले आज्ञाकारी भव
आज्ञाकारी अर्थात् बापदादा के आज्ञा रूपी कदम पर कदम रखने वाले। ऐसे आज्ञाकारी को ही सर्व संबंधों से परमात्म दुआयें मिलती हैं। यह भी नियम है। साधारण रीति भी कोई किसी के डायरेक्शन प्रमाण हाँ जी कहकर कार्य करते हैं तो जिसका कार्य करते उसकी दुआयें उनको जरूर मिलती हैं। यह तो परमात्म दुआयें हैं जो आज्ञाकारी आत्माओं को सदा डबल लाइट बना देती हैं।


स्लोगन:-

दिव्यता और अलौकिकता को अपने जीवन का श्रंगार बना लो तो साधारणता समाप्त हो जायेगी।