29-07-18 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 25-12-83 मधुबन


संगमयुग के दिन बड़े ते बड़े मौज मनाने के दिन

आज बड़े ते बड़ा बाप बड़े ते बड़े बच्चों को बड़े दिन की बधाई दे रहे हैं। सभी किसमिस से भी मीठे बच्चों को क्रिसमिस की बधाई दे रहे हैं। बड़े ते बड़े दिन संगमयुग के दिन हैं। बुरे दिन खत्म हो खुशी के, उत्साह में रहने के उत्सव का दिन संगमयुग है। जिस दिन वृक्षपति कल्प-वृक्ष की कहानी सुनाते हैं। इसी संगमयुग के बड़े दिन पर कल्प वृक्ष के फाउन्डेशन में चमकती हुई श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माएं जगमगाती हुई सारे वृक्ष को जगमगाती हैं। लकी सितारे, लवली सितारे, वृक्ष को अति सुन्दर बना देते हैं। वृक्ष के डेकोरशन चैतन्य जगमगाते सितारे हैं। वृक्ष में व्हाइट और लाइट फरिश्ते चमकते हुए वृक्ष को चमकाते हैं। इसी का यादगार आज के दिन क्रिसमस ट्री के रूप में सजाते हैं। संगम के बड़े दिन में उत्साह के उत्सव के दिन में, रात को दिन बना देते हैं। अंधकार को रोशनी में बदल लेते हैं। ब्राह्मण परिवार संगम के बड़े दिन पर मिलकर आत्मा का भोजन, ब्रह्मा भोजन प्यार से खाते हैं इसलिए यादगार रूप में भी सपरिवार मिलकर खाते-पीते मौज मनाते हैं। सारे कल्प में मौज मनाने का दिन वा मौजों का युग संगमयुग है, जिस संगमयुग में जितना चाहें दिल भरकर मौज मना सकते हैं। ज्ञान अमृत का नशा लवलीन बना देता है। इस रूहानी नशे का अनुभव विशेष बड़े दिन पर करते हैं। संगमयुग के ब्रह्म-महूर्त में अमृतवेले में श्रेष्ठ जन्म की आंख खोली और क्या मिला! कितनी सौगातें मिली? आंख खोली बूढ़ा बाबा देखा। सफेद-सफेद बाबा देखा। सफेद में लाल देखा ना! कौन देखा? शान्ति कर्ता बाप देखा। कितनी सौगातें दी? इतनी सौगातें दी जो जन्म-जन्म उन सौगातों से ही पलते रहेंगे। कुछ खरीद नहीं करना पड़ेगा। सबसे बड़ी से बड़ी सौगात हीरे से भी मूल्यवान स्नेह का कंगन, ईश्वरीय जादू का कंगन दिया। जिस द्वारा जो चाहो जब चाहो संकल्प से आह्वान किया और प्राप्त हुआ। अप्राप्त कोई वस्तु नहीं ब्राह्मणों के खज़ाने में। ऐसी सौगात ऑख खोलते ही सभी बच्चों को मिली। सबको मिली है ना। कोई रह तो नहीं गया ना। यह है बड़े दिन का महत्व। फर्स्ट ब्राह्मण आत्माओं का यादगार, लास्ट धर्म तक भी निशानी अब तक चल रही है क्योंकि आप ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्माएं सारे वृक्ष के फाउन्डेशन हो। सर्व आत्माओं के दादे परदादे तो आप ही हो ना। आपकी यह शाखायें हैं। वृक्ष का फाउन्डेशन आप बड़े ते बड़े ब्राह्मण हो इसलिए हर धर्म की आत्मायें किसी न किसी रूप में आप आत्माओं को और आपके संगमयुगी रीति रसम को अभी तक भी मनाते रहते हैं। ऐसी परमपरा की पूज्य आत्माएं हो। परम आत्मा से भी डबल पूज्य आप हो। ऐसे स्वयं को बड़े ते बड़े, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ समझते हुए मौजों के दिन मना रहे हो ना! मनाने के दिन कितने थोड़े से हैं। कल्प के हिसाब से एक ही बड़ा दिन खूब मनाओ। खुशी में नाचो। ब्रह्मा भोजन खाओ और खुशी के गीत गाओ। और कोई फिकर है क्या! बेफिकर बादशाह सारा दिन क्या करते हैं? मौज मनाते हैं ना। मन की मौज मनाओ। हद के दिन की मौज नहीं मनाना। बेहद के दिन की, बेहद के बेगम की मौज मनाओ। समझा! ब्राह्मण संसार में आये हो, किसलिए? मौज मनाने के लिए। अच्छा।

आज विशेष चारों ओर के डबल विदेशी बच्चों को मौजों के दिन बड़े ते बड़े दिन मनाने की विशेष मुबारक हो। बापदादा विशेष मिलन की सौगात देने के लिए आये हैं। अभी तो बहुत थोड़े हो फिर भी इतना दूर बैठना पड़ता है। जब वृद्धि को प्राप्त होंगे तो फिर दर्शन मात्र रह जायेंगे। फिर मिलने का चान्स नहीं होगा। सिर्फ दर्शन करने का। दृष्टि, दर्शन में बदल जायेगी। अन्त में जो सिर्फ दृष्टि मिलेगी वह भक्ति में दर्शन शब्द में बदल जायेगी। डबल विदेशियों को विशेष नशा कौन सा है? एक गीत है ना - ऊंची-ऊंची दीवारें, ऊंचे-ऊंचे समुद्र, दुनिया के देशों की दीवारें तो हैं। तो ऊंचे-ऊंचे देशों की दीवारें, धर्म की दीवारें, नॉलेज की दीवारें, मान्यताओं की दीवारें, रसम-रिवाज की दीवारें, सब पार करते आ गये हो ना। मिलते तो भारतवासी भी हैं, भारतवासियों को भी वर्सा मिला लेकिन देश का देश में मिला। इतनी ऊंची दीवारें पार नहीं करनी पड़ी। सिर्फ भक्ति की दीवार क्रास की। लेकिन डबल विदेशी बच्चों ने अनेक प्रकार की ऊंची दीवारें पार की, इसलिए डबल नशा है। अनेक प्रकार के पर्दों की दुनिया को पार किया इसलिए पार करने वाले बच्चों को डबल याद-प्यार। मेहनत तो की है ना। लेकिन बाप की मुहब्बत ने मेहनत भुला दी। अच्छा।

सर्वश्रेष्ठ पूज्य आत्माओं को, सर्व को लाइट माइट देने वाले बड़े ते बड़े बच्चों को, मौजों के संसार में सदा रूहानी मौज मनाने वाले, हर दिन उत्सव समझते उत्साह में रहने वाले, बेहद की ईश्वरीय सौगात प्राप्त करने वाले, ऐसे कल्पवृक्ष के चमकते हुए, जगमगाते हुए श्रेष्ठ सितारों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

विदेशी भाई-बहनों से पर्सनल मुलाकात

1) सभी अपने को सिकीलधे समझते हो ना? कितने सिक व प्रेम से बाप ने कहाँ-कहाँ से चुनकर एक गुलदस्ते में डाला है। गुलदस्ते में आकर सभी रूहे गुलाब बन गये। रूहे गुलाब अर्थात् अविनाशी खुशबू देने वाले। ऐसे अपने को अनुभव करते हो? हरेक को यही नशा है ना कि हम बाप को प्रिय हैं! हरेक कहेगा कि मेरे जैसा प्यारा बाप को और कोई नहीं है। जैसे बाप जैसा प्रिय और कोई नहीं। वैसे बच्चे भी कहेंगे क्योंकि हरेक की विशेषता प्रमाण बाप को सभी से विशेष स्नेह है। नम्बरवार होते हुए भी सभी विशेष स्नेही हैं। बच्चों के मूल्य को सिर्फ बाप जाने और आप जानों और कोई नहीं जान सकता। दूसरे तो आप लोगों को साधारण समझते हैं, लेकिन कोटों में कोई और कोई में भी कोई आप हो, जिसको बाप ने अपना बना लिया। बाप का बनते ही सर्व प्राप्तियाँ हो गई। खजानों की चाबी बाप ने आप सबको दे दी। अपने पास नहीं रखी। इतनी चाबियाँ हैं जो सबको दी है। यह मास्टर की (चाबी) ऐसी है जो जिस खजाने को लगाना चाहो लगाओ और खजाना प्राप्त करो। मेहनत नहीं करनी पड़ती। वैसे भी लण्डन राज्य का स्थान है ना। प्रजा बनने वाले नहीं। सभी सेवा में आगे बढ़ने वाले। जहाँ प्राप्ति है, वहाँ सेवा के सिवाए रह नहीं सकते। सेवा कम अर्थात् प्राप्ति कम। प्राप्ति स्वरूप बिना सेवा के रह नहीं सकते। देखो, आप लोग कितना भी देश छोड़कर विदेश चले गये, तो भी बाप ने विदेश से भी ढूँढकर अपना बना लया। कितना भी भागे फिर भी बाप ने तो पकड़ लिया ना। अच्छा।

आस्ट्रेलिया ग्रुप से:- सभी महावीर हो ना। महावीर ग्रुप अर्थात् सदा के लिए माया को विदाई देने वाले। ऐसी सेरीमनी मनाई है? आस्ट्रेलिया को सदा बापदादा बहादुरों का स्थान कहते हैं। तो आस्ट्रेलिया निवासी सदा ही माया को विदाई देने वाले क्योंकि जब बाप साथ है तो बाप के साथ होते माया आ नहीं सकती। सदा बाप साथ है तो विदाई हो गई ना। विदाई देने वाले सदा सन्तुष्टमणि। स्वयं भी सन्तुष्ट, सेवा से भी सन्तुष्ट, सम्पर्क में भी सन्तुष्ट। सबमें सन्तुष्ट। ऐसी सन्तुष्ट मणियाँ सदा दिलतख्तनशीन हैं। तो जो तख्तनशीन होगा वह सदा खुशी और नशे में रहेगा। बापदादा सन्तुष्ट मणियाँ, महावीर, मायाजीत ग्रुप देख रहे हैं। सभी अनुभवी आत्मायें दिखाई दे रही हैं। सेवाधारी भी हैं। जैसे सेवा की विशेषता में लण्डन का विशेष पार्ट है वैसे आस्ट्रेलिया का भी विशेष पार्ट है। बापदादा आस्ट्रेलिया निवासियों को सदा सेवा में एवररेडी और सदा सेवा में वृद्धि को पाने वाले, ऐसा सर्टीफिकेट देते हैं। अच्छा-

विदाई के समय:- अभी आप सब जाग रहे हो, आप सभी के लिए कहाँ न कहाँ जागरण होता रहता है। जब आपके भक्त जागरण करते हैं तो आपने किया तो क्या बड़ी बात है। सभी शुरू संगम से ही होता है। जो आप ज्ञान से करते उसे वह भक्ति से करते हैं। भक्ति का फाउन्डेशन भी संगम पर ही पड़ता है। वह भावना और यह ज्ञान। सभी सेवा पर जा रहे हो, घर में जा रहे हो, नहीं, जाना अर्थात् सेवा का सबूत फिर से ले आना। खाली हाथ नहीं आना। कम से कम गुलदस्ता तो भेंट किया जाता है। गुलदस्ता लाओ या बटन। फार्म में यह भी क्वेश्चन एड करना कि एक साल में कितने तैयार किये! जो खाली आये उसको दूसरी बार सर्टीफिकेट नहीं देना। एक साल में एक तो तैयार करके साथ में लेकर आओ। अच्छा।

अव्यक्त महावाक्य - वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को शक्तिशाली बनाओ

सबसे तीव्रगति की सेवा है - ''वृत्ति द्वारा वायब्रेशन फैलाना''। वृत्ति बहुत तीव्र राकेट से भी तेज है। वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को परिवर्तन कर सकते हो। जहाँ चाहो, जितनी आत्माओं के प्रति चाहो वृत्ति द्वारा यहाँ बैठे-बैठे पहुंच सकते हो। वृत्ति द्वारा दृष्टि और सृष्टि परिवर्तन कर सकते हो। सिर्फ वृत्ति में सर्व के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना हो। विश्व कल्याण करने के लिए आपकी वृत्ति, दृष्टि और स्थिति सदा बेहद की हो। वृत्ति में ज़रा भी किसी आत्मा के प्रति निगेटिव या व्यर्थ भावना नहीं हो। निगेटिव बात को परिवर्तन कराना, वह अलग चीज़ है। लेकिन जो स्वयं निगेटिव वृत्ति वाला होगा वह दूसरे के निगेटिव को पॉजेटिव में चेंज नहीं कर सकता।

जैसे स्थापना के आदि में साधन कम नहीं थे, लेकिन बेहद के वैराग्य वृत्ति की भट्ठी में पड़े हुए थे। यह 14 वर्ष जो तपस्या की, वह बेहद के वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल था। बापदादा ने अभी साधन बहुत दिये हैं, साधनों की कोई कमी नहीं है लेकिन होते हुए बेहद का वैराग्य हो। आपके वैराग्य वृत्ति के वायुमण्डल के बिना आत्मायें सुखी, शान्त बन नहीं सकती, परेशानी से छूट नहीं सकती, तो सब आवश्यक साधन यूज़ करो लेकिन जितना हो सकता है उतना दिल के वैराग्य वृत्ति से, साधनों के वशीभूत होकर नहीं। अभी साधना का वायुमण्डल चारों ओर बनाओ। समय समीप के प्रमाण अभी सच्ची तपस्या वा साधना है ही ''बेहद का वैराग्य।''

वर्तमान समय विश्व में एक तरफ भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि है, दूसरे तरफ आप बच्चों का पावरफुल योग अर्थात् लगन की अग्नि ज्वाला रूप में आवश्यक है। यह ज्वाला रूप इस भ्रष्टाचार, अत्याचार के अग्नि को समाप्त कर सर्व आत्माओं को सहयोग देगा। आपकी लगन ज्वाला रूप की हो अर्थात् पावरफुल योग हो, वृत्ति में सबके कल्याण की भावना हो, तो यह लगन की अग्नि, उस अग्नि को समाप्त करेगी और दूसरे तरफ आत्माओं को परमात्म सन्देश की, शीतल स्वरूप की अनुभूति करायेगी। इसके लिए अभी दृष्टि-वृत्ति में पवित्रता को और भी अण्डरलाइन करो लेकिन मूल फाउण्डेशन - अपने संकल्प को शुद्ध बनाओ, ज्ञान स्वरूप बनाओ, शक्ति स्वरूप बनाओ। तो आपके वायब्रेशन से, वृत्ति से, शुभ भावना से दूसरे की माया सहज भाग जायेगी। अगर क्यों, क्या में जायेंगे, तो न आपकी माया जायेगी न दूसरे की जायेगी।

अभी आप बच्चों को दो प्रकार के कार्य करने हैं - एक तो आत्माओं को योग्य और योगी बनाना है, दूसरा धरणी को भी तैयार करना है। इसके लिए विशेष वाणी के साथ-साथ वृत्ति को और तीव्र गति देनी पड़ेगी क्योंकि वृत्ति से वायुमण्डल बनेगा और वायुमण्डल का प्रभाव प्रकृति पर पड़ेगा, तब तैयार होंगे। वाणी और वृत्ति दोनों साथ-साथ सेवा में लगे रहें। आपके बोल, कर्म और वृत्ति से हल्केपन का अनुभव हो। ऐसे नहीं, मैं तो हल्का हूँ लेकिन दूसरे मेरे को नहीं समझते, पहचानते नहीं। अगर नहीं पहचानते तो आप अपने विल पॉवर से उन्हों को भी पहचान दो। 95 परसेन्ट सबके दिलपसन्द बनो। आपके कर्म, वृत्ति उसको परिवर्तन करें। इसमें सिर्फ सहनशक्ति को धारण करने की आवश्यकता है। अगर आपकी वृत्ति में श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना है तो सेकण्ड के संकल्प से, दृष्टि से अपने दिल के मुस्कराहट से सेकण्ड में भी किसी को बहुत कुछ दे सकते हो। जो भी आवे उसको गिफ्ट दो, खाली हाथ नहीं जाये।

हर व्यक्ति को, बात को पॉजिटिव वृत्ति से देखो, सुनो या सोचो तो कभी जोश या क्रोध नहीं आयेगा। आप मास्टर स्नेह के सागर हो तो आपके नयन, चैन, वृत्ति, दृष्टि में ज़रा भी और कोई भाव नहीं आ सकता, इसलिए चाहे कुछ भी हो जाये, सारी दुनिया क्यों नहीं आप पर क्रोध करे लेकिन मास्टर स्नेह के सागर दुनिया की परवाह नहीं करो। बेपरवाह बादशाह बनो, तब आपकी श्रेष्ठ वृत्तियों से शक्तिशाली वायुमण्डल बनेगा। जैसे आजकल साइन्स के साधनों द्वारा ऱफ माल को भी बहुत सुन्दर रूप में बदल देते हैं तो आपकी श्रेष्ठ वृत्ति निगेटिव अथवा व्यर्थ को पॉजिटिव में बदल दे। आपका मन और बुद्धि ऐसा बन जाये जो निगेटिव टच नहीं करे, सेकण्ड में परिवर्तन हो जाये। अच्छा।

 

वरदान:-

दिनचर्या की सेटिंग और बाप के साथ द्वारा हर कार्य एक्यूरेट करने वाले विश्व कल्याणकारी भव
दुनिया में जो बड़े आदमी होते हैं उनकी दिनचर्या सेट होती है। कोई भी कार्य एक्यूरेट तब होता है जब दिनचर्या की सेटिंग हो। सेटिंग से समय, एनर्जी सब बच जाते हैं, एक व्यक्ति 10 कार्य कर सकता है। तो आप विश्व कल्याणकारी जिम्मेवार आत्मायें, हर कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए दिनचर्या को सेट करो और बाप के साथ सदा कम्बाइन्ड होकर रहो। हजार भुजाओं वाला बाप आपके साथ है तो एक कार्य के बजाए हजार कार्य एक्यूरेट कर सकते हो।


स्लोगन:-

सर्व आत्माओं प्रति शुद्ध संकल्प करना ही वरदानी मूर्त बनना है।