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Ref: 28.07.1971


"...अलौकिक होंगे तो

फिर अपने को

इस लोक के निवासी

नहीं समझेंगे।

 

समझेंगे कि इस पृथ्वी पर

पांव नहीं हैं

अर्थात् बुद्धि का लगाव

इस दुनिया में नहीं है।

 

बुद्धि रूपी पांव

देह रूपी धरती से ऊंचा है।

यह खुशी की निशानी है।

 

जितना-जितना देह के

भान की तरफ से

बुद्धि ऊपर होगी

उतना वह अपने को

फरिश्ता महसूस करेगा।

 

हर कर्त्तव्य करते

बाप की याद में

उड़ते रहेंगे

तो उस अभ्यास का

अनुभव होगा।..."

 

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