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Ref: 18.06.1973

"...संगमयुगी

ब्राह्मणों की विशेषता

सदा स्मृति स्वरूप की है।

 

तो ब्राह्मणपन की विशेषता

अनुभव करते हो?

शूद्रपन अर्थात्

विस्मृत स्वरूप।

 

ब्राह्मण बन कर भी

फिर विस्मृति में आये

तो शूद्र और ब्राह्मण में

अन्तर ही क्या हुआ?

 

मरजीवा जन्म की

अलौकिकता क्या हुई?

 

विस्मृति लौकिकता है अर्थात्

वह इस लोक की रीति-रस्म है।

ब्राह्मण की रस्म

‘सदा स्मृति स्वरूप है।’

 

कब भी अपने लौकिक कुल

की रीति-रस्म व

मर्यादायें किसको भूलती हैं क्या?

 

ब्राह्मण कुल की रीति-रस्म

वा मर्यादायें

ब्राह्मण ही भूल जायें

यह सम्भव (आसान) है क्या?

 

ब्राह्मणों के रीति-रस्म

अलौकिक हैं।

इस रीति-रस्म में चलना

साधारण और सहज बात है

क्योंकि जब हैं ही ब्राह्मण।

 

दूसरे कुल की रीति-रस्म अपनाना

मुश्किल हो सकती है।

लेकिन

यह तो आपके

आदि की रीति-रस्म है।

नेचरल जीवन की बात है।..."

 

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